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लखनऊ। लखनऊ अग्निकांड में उत्तराखंड के पौड़ी का पंकज भी फंस गया था।मौत को इतने करीब से देखने के बाद पंकज गहरे सदमे में हैं। उनकी आंखें और कांपते होंठ उस खौफ की गवाही दे रहे हैं। पंकज ने कांपती आवाज में बताया कि पल भर में चारों तरफ सिर्फ काला धुआं था। सांसें उखड़ रही थीं और लोग जान बचाने के लिए बदहवास भाग रहे थे।

जब बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझा, तो उन्होंने हिम्मत कर खिड़की का शीशा तोड़ा। कांच के टुकड़ों के बीच रेलिंग के सहारे आगे बढ़कर, एक पाइप को पकड़कर वे किसी तरह नीचे उतरे। जान तो बच गई, लेकिन रूह पर कभी न मिटने वाला जख्म लग गया। पंकज का कहना है कि हादसे के करीब एक घंटे बाद तक न फायर ब्रिगेड आई और न एंबुलेंस। तब तक कई मासूम जिंदगियां अंदर ही खामोश हो चुकी थीं। लोगों की चीखें कानों में गूंज रही हैं, मैं चाहकर भी किसी को बचा नहीं सका।

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