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नैनीताल। हाईकोर्ट ने जाली नोट के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। न्यायाधीश रवद्रिं मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने निर्णय सुनाते हुए कहा, कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ दोष सद्धि करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश करने में विफल रहा।

अल्मोड़ा के सत्र न्यायालय ने मार्च 2017 में आरोपी गरीबा महतो को धारा 489बी के तहत उम्रकैद और धारा 420 के तहत सात साल की सजा सुनाई थी। वहीं, अन्य दो आरोपियों वाल्मीकि चौधरी और समर मंडल को धारा 489सी के तहत सात-सात साल के कठोर कारावास की सजा मिली थी। इन सभी ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अभियोजन के अनुसार, तीन अगस्त 2016 को गरीबा महतो ने द्वाराहाट में एक दुकान से 100 रुपये की चप्पल खरीदी और 1000 रुपये का नोट दिया। दुकानदार को बाद में नोट के नकली होने का संदेह हुआ, जिसके बाद पुलिस ने अगले दिन तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर उनसे 2 लाख रुपये के जाली नोट बरामद करने का दावा किया था। सुनवाई में कोर्ट ने पाया कि मामले में कोई शिनाख्त परेड आयोजित नहीं की गई थी। अदालत ने टिप्पणी की, कि आरोपी दुकानदार के लिए अजनबी थे, इसलिए बिना किसी पूर्व शिनाख्त के अदालत में सीधे पहचान करना संदिग्ध और कमजोर साक्ष्य है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया, कि केवल जाली नोटों का कब्जे में होना सजा के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह साबित करना जरूरी था, कि आरोपियों को पता था कि नोट नकली हैं और वे उन्हें असली के रूप में इस्तेमाल करना चाहते थे। भारतीय दंड संहिता में इसके लिए कोई पूर्व धारणा नहीं है। अदालत ने यह भी नोट किया कि फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट को आरोपियों के सामने सीआरपीसी की धारा 313 के तहत बयान दर्ज करते समय नहीं रखा था।

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