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देहरादून। उत्तराखंड एसटीएफ की हालिया जांच में सोशल मीडिया के माध्यम से कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और युवाओं की भर्ती के एक संगठित नेटवर्क का खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े हैंडलर्स और आतंकवादी संगठन युवाओं को सीधे अपने नेटवर्क में शामिल नहीं करते बल्कि इसके लिए लेयरिंग मॉड्यूल की एक सुनियोजित प्रक्रिया अपनाते हैं। हाल ही में गदरपुर से गिरफ्तार किए गए मोहम्मद सलाउद्दीन को भी इसी माड्यूल से जोड़ा गया था।

 

 

 

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्पेशल टास्क फोर्स उत्तराखंड (एसएसपी एसटीएफ) अजय सिंह ने इस बारे में जानकारी दी। भर्ती की शुरुआत सोशल मीडिया और मैसेजिंग एप्स से होती है। पहले संभावित युवाओं को व्हाट्सएप, टेलीग्राम और अन्य ऑनलाइन समूहों में जोड़ा जाता है। इन समूहों में बड़ी संख्या में लोगों को शामिल कर उग्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देने वाली सामग्री, वीडियो, पोस्ट और संदेश साझा किए जाते हैं।

पता चला है कि इन समूहों में मौजूद लोगों की प्रतिक्रियाओं पर लगातार नजर रखी जाती है। कौन व्यक्ति किस प्रकार की सामग्री पर अधिक प्रतिक्रिया दे रहा है, कौन उग्र विचारों का समर्थन कर रहा है और कौन कट्टरपंथी सोच की ओर झुकाव दिखा रहा है, इसका विस्तृत आकलन किया जाता है। इसके बाद ज्यादा सक्रिय और उग्र प्रतिक्रिया देने वाले व्यक्तियों को चुनकर दूसरे स्तर के बंद समूहों में शामिल किया जाता है।

 

इन समूहों में उनकी मानसिकता, प्रतिबद्धता और संगठन के प्रति झुकाव की और गहराई से परीक्षा ली जाती है। इस प्रक्रिया को कई चरणों में दोहराकर उनका ब्रेनवाश किया जाता है। अंतिम चरण में केवल चुनिंदा लोगों को ऐसे गुप्त ग्रुप्स में शामिल किया जाता है जिन्हें सीधे आईएसआई से जुड़े हैंडलर्स या आतंकवादी संगठन संचालित करते हैं।

 

यहां उन्हें कट्टरपंथी विचारधारा से और अधिक प्रभावित करने, गोपनीय संवाद स्थापित करने और विभिन्न गतिविधियों के लिए तैयार करने का प्रयास किया जाता है। जांच कर रहे अधिकारियों का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया बेहद सुनियोजित और लंबी होती है जिसमें किसी व्यक्ति की मानसिकता को समझने और उसे प्रभावित करने के लिए कई स्तरों पर निगरानी की जाती है।

 

( सौजन्य अमर उजाला )

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