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हल्द्वानी। हल्द्वानी में मई दिवस कार्यक्रम बुधपार्क में विभिन्न ट्रेड यूनियनों, राजनीतिक-सामाजिक संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से मनाया गया। जिसमें ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ़ ट्रेड यूनियंस (ऐक्टू), पछास, उत्तराखण्ड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन, प्रगतिशील भोजनमाता संगठन, भाकपा माले, जनवादी लोक मंच, सनसेरा श्रमिक यूनियन, अखिल भारतीय किसान महासभा, उत्तराखंड परिवहन निगम संयुक्त परिषद, भीम आर्मी, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, मानवाधिकार रक्षा अभियान, आर एम एल यूनियन, जन मैत्री संगठन, पंजाब बेवल यूनियन, टाटा मोटर्स वर्कर्स यूनियन आदि संगठन शामिल रहे।

वक्ताओं ने कहा कि, इस साल हम ऐसा अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस मना रहे हैं जो 1 अप्रैल से मोदी सरकार के नए लेबर कोड थोपे जाने के बाद आया है. ये नए लेबर कोड मज़दूरों के अधिकार बेहतर करने, उनका दायरा बढ़ाने और श्रम कानूनों के पालन को मज़बूत करने के बजाय, भारत के विशाल मज़दूर वर्ग को एक कॉरपोरेट जंगलराज के हवाले कर रहे हैं—जहाँ मालिकों की तानाशाही को राज्य का पूरा संरक्षण हासिल है. आठ घंटे का कार्यदिवस अब कोई सार्वभौमिक अधिकार नहीं रह गया है. ठेका मज़दूरी और गिग इकॉनमी के इस दौर में यह धीरे-धीरे एक विशेषाधिकार बनता जा रहा है. काम के घंटों में बढ़ोतरी का मतलब अब ओवरटाइम की मज़दूरी नहीं, बल्कि महज़ अतिरिक्त शोषण है. ट्रेड यूनियन बनाना पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल कर दिया गया है, और सामूहिक सौदेबाज़ी की ताकत को बुरी तरह कमज़ोर किया गया है. वहीं मालिकों को मनमाने ढंग से कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के और भी ज़्यादा अधिकार दे दिए गए हैं।

वक्ताओं ने कहा कि, एनसीआर क्षेत्र और देशभर के औद्योगिक इलाकों से लेकर मदरसन तक में ठेका मज़दूरों के बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन फूट पड़े, जो तत्काल वेतन वृद्धि की माँग पर आधारित हैं. मज़दूर अब सिर्फ़ ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष करने को क्यों मजबूर हैं. लेकिन यूपी की ‘डबल इंजन’ मोदी–योगी सरकार मज़दूरों के इन आंदोलनों को ‘देश-विरोधी साज़िश’ करार दे रही है. मज़दूरों की आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ताओं को फँसाने के लिए उन्हें ‘मास्टरमाइंड’ बताकर गिरफ़्तार किया जा रहा है, और कथित तौर पर मज़दूरों को भड़काने और देश की बदनामी का आरोप लगाया जा रहा है. सरकार मज़दूरों के आंदोलनों को बर्बर बल-प्रयोग से कुचलने पर उतारू है।

कहा कि, दुनिया भर के मज़दूर वर्ग ने दशकों तक चले जुझारू संघर्षों और बड़ी कुर्बानियों के बाद ट्रेड यूनियन के बुनियादी अधिकार हासिल किए. इसी ताक़त के दम पर उन्होंने पूँजीवाद की उस बर्बर व्यवस्था में क़ायदे-कानूनों की कुछ हद तक जगह बनाई, जिसने औपनिवेशिक लूट और साम्राज्यवादी हमलों के ज़रिये पूरी दुनिया में अपने पैर पसार लिए थे. आठ घंटे का कार्यदिवस पूँजीवादी व्यवस्था की कोई “सभ्यतागत देन” नहीं था, बल्कि यह लगातार संघर्षों, बड़े उथल-पुथल और हेयमार्केट शहीदों (मई 1886) की सर्वोच्च कुर्बानी से हासिल किया गया अधिकार था. इसी संघर्ष के बाद मई दिवस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़दूरों के गौरवशाली संघर्ष दिवस के रूप में स्थापित हो गया और दुनिया भर में मनाया जाने लगा।

वक्ताओं ने कहा कि, भारत में भी आठ घंटे के कार्यदिवस का संघर्ष लगभग उसी दौर में शुरू हुआ, जब रेलवे से लेकर कपड़ा मिलों तक के मज़दूरों ने हड़तालें करना और अपनी यूनियनें बनाना शुरू किया. आज जब मोदी सरकार नए श्रम कोड थोपकर मज़दूर-विरोधी दमन को तेज़ कर रही है, तो उसका असली मक़सद भारतीय मज़दूर आंदोलन की उन ऐतिहासिक उपलब्धियों को मटियामेट करना है, जो दशकों के ख़ून-पसीने से हासिल की गई थीं. हमें आज नौजवानों और महिला मज़दूरों—के उभरते संघर्षों को एक ताक़तवर राजनीतिक धारा में पिरोना होगा. साथ ही किसानों, छात्रों व मज़दूरों के बीच गहरी, अटूट और जमीनी एकजुटता कायम करनी होगी. मज़दूर अधिकारों की लड़ाई को अब फ़ासीवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी प्रतिरोध की एक निर्णायक धारा में बदलना होगा और नए कम्पनी राज के खिलाफ भारत को आज़ादी के आंदोलन के इस नए दौर में आगे ले जाना होगा।

मई दिवस पर श्रम-विरोधी, कारपोरेट-परस्त श्रम कोड रद्द करने,संघर्षरत मज़दूरों पर दमनकारी कार्रवाई बंद करो! सभी गिरफ़्तार मज़दूरों को बिना शर्त और तुरंत रिहा करो! गिरफ़्तार ट्रेड यूनियन नेताओं को रिहा करने,हर महीने 42,000 रुपये और हर दिन 1500 रुपये न्यूनतम मज़दूरी घोषित करने,12 घंटे काम करने की व्यवस्था को बंद करो! 8 घंटे से ज्यादा ओवरटाइम काम के लिए दोगुनी मजदूरी सुनिश्चित करने,
आशा, भोजनमाता, आंगनबाड़ी, कॉन्ट्रैक्ट, मानदेय, डेली वेज, अप्रेंटिसशिप, ट्रेनी, फिक्स्ड टर्म सबको परमानेंट करने, मजदूर आंदोलन के समर्थन और आंदोलनों के बर्बर दमन के विरोध किया गया। प्रस्ताव पास किया कि 2 अप्रैल 2026 को मानेसर (गुड़गांव), नोएडा से होते हुए मजदूरों का आंदोलन मदरसन से लेकर कई प्रदेशों में फैल गया। मजदूरों का आंदोलन कमर तोड़ महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ। भुखमरी के स्तर वाली मजदूरी को बढ़ाने की मांग मजदूर कर रहे थे। तात्कालिक तौर पर इसमें ईरान पर अमेरिका-इजरायल हमले से बढ़े तेल-गैस के दामों का भी असर रहा। औद्योगिक क्षेत्रों में श्रम कानूनों के घोर उल्लंघन को, मजदूरों ने बताया। स्वतः स्फूर्त रूप से शुरू हुए ये आंदोलन श्रम विभाग, शासन-प्रशासन स्तर पर मजदूरों की सुनवाई न होने के खिलाफ भी आक्रोश था। यह 1 अप्रैल से लागू किये गए मजदूर विरोधी 4 श्रम संहिताओं के विरोध में मजदूरों का असंतोष है।
• पूंजीपतियों के लिए भी यह साफ था कि वे अपने मजदूरों का भयावह शोषण कर रहे हैं। इसलिए मजदूर आंदोलन से घबराकर पूंजीपतियों के संघ सरकारों से न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग करने लगे। हरियाणा, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, आदि सरकारों ने मामूली बढ़ोतरी करने के साथ मजदूरों का बर्बर दमन किया। सैकड़ों मजदूरों और मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इन मजदूरों पर हत्या के प्रयास, आगजनी, आदि गंभीर धाराओं में आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इससे साफ है कि सरकार मजदूर आंदोलन का ‘गाजर-डंडे’ की तर्ज पर दमन कर रही है।
1 मई अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर हल्द्वानी में आयोजित यह सभा मजदूरों के स्वतः स्फूर्त जुझारू आंदोलन का पुरजोर समर्थन करती है। सभा उत्तरप्रदेश में मई दिवस मनाने से रोकने के लिए विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ताओं को नजरबंद (हाउस अरेस्ट) करने की भर्त्सना करती है। सभा मजदूर आंदोलन के बर्बर पुलिस दमन के विरोध का प्रस्ताव लेती है।

मई दिवस कार्यक्रम में मुख्य रूप से के के बोरा, बहादुर सिंह जंगी, रजनी जोशी, मनोज पांडे, महेश, चंदन, डॉ कैलाश पाण्डेय, रिंकी जोशी, हेमा तिवारी, यतीश पंत, जोगेंद्र लाल, नवीन बिष्ट, कार्तिक नेगी, एडवोकेट कैलाश जोशी, नफीस अहमद खान, दिनेश आर्य, इस्लाम हुसैन, उमेश तिवारी विश्वास, दीपा आर्य, रीना आर्य, चंपा गिनवाल, अलिशा, हेमा पलड़िया, राहुल रावत, पार्षद रवि वाल्मीकि, पंकज थापा, बची सिंह बिष्ट, धन सिंह गड़िया, राजेन्द्र जोशी, महेश तिवारी, महेश जोशी, मंजू रावत, रोशनी, लीला, पुष्पा, रश्मि, रजनी, चन्द्रशेखर भट्ट, प्रकाश फ़ूलोरिया, अमित कोहली, योगेश, सावित्री, ममता, भारती, तुलसी, कमला, सुनीता मेहरा आदि समेत बड़ी संख्या में मजदूर शामिल रहे।

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